पत्रकारिता की दुकान में ‘कंस्पिरेन्सी थ्योरी’ का नया काउंटर!

अनिल तिवारी, बेबाक पत्रकार
कहानी तैयार, किरदार तैयार, सनसनी तैयार… बस तथ्य अभी रास्ते में हैं!पत्रकारिता की दुनिया में कभी खबर पहले आती थी और कहानी बाद में बनती थी। अब लगता है जमाना थोड़ा आधुनिक हो गया है—पहले कहानी बनाइए, फिर कहानी के हिसाब से तथ्य खोजिए और अंत में उसे ‘चौंकाने वाला खुलासा’ लिखकर परोस दीजिए। दुकान सजी हो, भाषा चमकदार हो और शीर्षक में ‘घर के भीतर से’, ‘चौंकाने वाला’, ‘परेशान’ और ‘बड़ा खुलासा’ जैसे मसाले हों तो पाठक बेचारा समझे कि जरूर कोई बड़ा भूकंप आया है!लेकिन पत्रकारिता में एक छोटी-सी परेशानी है—तथ्य नाम की चीज भी होती है।
किसी को ‘परेशान’ बता देना आसान है, मगर सवाल यह है कि परेशान कौन है? संबंधित व्यक्ति ने खुद कहा? कोई दस्तावेज है? कोई स्वतंत्र स्रोत है? या फिर रिपोर्ट लिखने वाले की कल्पना ने ही परेशानी का प्रमाणपत्र जारी कर दिया?इसी तरह ‘Defamation’ यानी मानहानि शब्द को खबर में चिपका देने से मामला अपने आप सनसनीखेज नहीं हो जाता। कानून अपने प्रमाण मांगता है और पत्रकारिता भी। चार कहानियों को एक साथ रखकर उनसे कोई बड़ा निष्कर्ष निकाल देना खबर का गणित नहीं, कल्पना का गुणा-भाग हो सकता है।
और यदि किसी विज्ञापन, भुगतान या किस्त का संदर्भ जोड़कर किसी व्यक्ति अथवा संस्था के बारे में कोई बड़ा निष्कर्ष निकाला जा रहा है, तो पत्रकारिता का सीधा सवाल होना चाहिए—प्रमाण कहां है?पत्रकारिता में विज्ञापन हो सकता है, व्यावसायिक संबंध हो सकते हैं, संस्थागत प्रक्रियाएं हो सकती हैं; लेकिन हर व्यावसायिक गतिविधि को रहस्य और हर सामान्य घटनाक्रम को षड्यंत्र बना देना पत्रकारिता नहीं है।
विडंबना यह है कि आज कुछ लोग सवाल पूछने की आड़ में पहले फैसला लिख देते हैं। फिर उस फैसले को सही साबित करने के लिए शब्दों की बारात निकालते हैं।
शीर्षक इतना बड़ा कि पाठक चौंक जाए और तथ्य इतने छोटे कि खोजने पर भी नजर न आएं!लेकिन असली पत्रकारिता का आईना इससे अलग है।सरकार अच्छा काम कर रही हो तो उसकी तारीफ करना अपराध नहीं और सरकार की कमी बताना भी अपराध नहीं। पत्रकार का काम न सरकार की पीआर मशीन बनना है, न विपक्ष का प्रचारक। काम सिर्फ इतना है—जो है, वही बताना; जो नहीं है, उसे गढ़ना नहीं।
यदि व्यवस्था सामान्य रूप से चल रही है, कामकाज बेहतर हो रहा है और किसी कथित परेशानी की पुष्टि संबंधित पक्ष नहीं करता, तो केवल शब्दों की बाजीगरी से संकट पैदा नहीं किया जा सकता।
आज पत्रकारिता को सबसे ज्यादा जरूरत ‘ब्रेकिंग न्यूज’ की नहीं, ‘ब्रेकिंग फैक्ट्स’ की है।क्योंकि खबर में सवाल जरूर होने चाहिए, लेकिन सवाल के साथ सबूत भी होना चाहिए। आलोचना जरूर हो, लेकिन आरोप के साथ प्रमाण भी होना चाहिए। वरना स्थिति यही होगी—दुकान विशाल, बोर्ड चमकदार, कहानी शानदार… और काउंटर पर तथ्य पूछते ही सन्नाटा!पत्रकारिता कहानी बेचने की दुकान नहीं है। यह भरोसा कमाने की जिम्मेदारी है।और भरोसा एक बार टूट जाए तो सबसे बड़ा ‘खुलासा’ भी उसे वापस नहीं ला सकता।





