उत्तर प्रदेश के महिला पॉलिटेक्निकों में भ्रष्टाचार का तांडव: संजीव सिंह के दोहरे प्रभार और काले कारनामों का सनसनीखेज कच्चा चिट्ठा
राजनीतिक संरक्षण, आजमगढ़ के निजी संस्थानों से गठजोड़ और वित्तीय अनियमिताओं का अड्डा बना जीकप

अनिल तिवारी, बेबाक पत्रकार
उत्तर प्रदेश के तकनीकी शिक्षा विभाग में सुचिता, पारदर्शिता और महिला सशक्तिकरण के तमाम सरकारी दावे कागजी साबित हो रहे हैं। राजकीय महिला पॉलिटेक्निक, लखनऊ और संयुक्त प्रवेश परीक्षा (जीकप) से सामने आ रहे खुलासे अत्यंत गंभीर हैं। पूर्व में महिला पॉलिटेक्निकों की बदहाली और संबद्धीकरण सिंडिकेट का पर्दाफाश किए जाने के बावजूद, इस दुष्चक्र को संचालित करने वाले अधिकारी नियमों को ताक पर रख रहे हैं।
इस पूरे प्रकरण के केंद्र में प्रधानाचार्य एवं जीकप सचिव संजीव सिंह की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं। अपने काले कारोबार को बेरोक-टोक चलाने के लिए उनके पास जीकप सचिव का दोहरा प्रभार है साथ ही कंप्यूटर का कोई ज्ञान न होने के बावजूद सिंह साहब को टेक्निकल सेल का भी नोडल अधिकारी बनाये जाने की भी तकनीकी शिक्षा के गलियारों में चर्चा है कि भ्रष्टाचार के इन मामलों में उच्च स्तर पर प्रभावी कार्रवाई की आवश्यकता है।
चर्चा में यह भी है की संजीव सिंह का रिटायरमेंट 2027 के शुरू के महीनों में है इसलिये यह जीकप से निकलने के मूड में हैं जिससे इनके कार्यकाल में हुए घपलों का समय रहते पर्दाफाश हो इसलिए संजीव सिंह के जीकप सचिव के पद के पूरे कार्यकाल की जाँच की तुरंत आवश्यकता है।
आजमगढ़ के निजी संस्थानों और सिंडिकेट के सरगना से सांठगांठ
संजीव सिंह का दायरा सिर्फ लखनऊ तक सीमित नहीं है, बल्कि आजमगढ़ के कई कुख्यात निजी संस्थानों और उनके संचालकों के साथ उनके पुराने संबंध बताए जा रहे हैं।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, जब वे प्राविधिक शिक्षा परिषद (बी.टी.ई.यू.पी.) के सचिव थे, तब केंद्रों के आवंटन और परीक्षा परिणामों में हेरफेर के जरिए चुनिंदा निजी कालेजों को लाभ पहुँचाने के आरोप लगे थे। इन्हीं कारणों से तत्कालीन प्रमुख सचिव श्रीमती राधा चौहान ने उन्हें सचिव पद से हटाकर दूरस्थ संस्थान में स्थानांतरित कर दिया था।
गरीब छात्रों की फीस से विलासिता और लग्जरी सुविधाएं
जीकप के नाम पर दूर-दराज से आने वाले लाचार और गरीब छात्रों की फीस से जमा होने वाली गाढ़ी कमाई के उपयोग को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। छात्रों के भविष्य को संवर्धित करने के बजाय इस धन के कथित तौर पर अन्य मदों में उपयोग की चर्चा है।जब भी प्रवेश परीक्षा के पैसों की बात आती है तब यह कहा जाता है की गोपनीयता की वजह से जीकप का ऑडिट नहीं हो सकता।
आरोप है कि जीकप के फंड से अधिकारियों के लिए महंगी और लग्जरी गाड़ियाँ, फ्लाइट के टिकट , महंगे कंप्यूटर लैपटॉप ,मोबाइल तथा अन्य सुख-सुविधाओं की व्यवस्था सब गरीब छात्रों के पैसों से की जा रही है। यदि यही धन महिला पॉलिटेक्निक संस्थाओं की बदहाली सुधारने, शिक्षकों की नियुक्ति करने और बुनियादी सुविधाएँ जुटाने में खर्च किया जाए, तो आज प्रदेश की शिक्षण संस्थानों की यह स्थिति बढ़िया हो जाए।
रामभरोसे महिला पॉलिटेक्निक: एकल पदों का अवैध संबद्धीकरण और वित्तीय अनियमितताएँ
राजकीय महिला पॉलिटेक्निक, लखनऊ की स्थिति यह है कि कई प्रमुख शाखाओं में न तो नियमित शिक्षक हैं और न ही वार्डन। संस्था के होस्टल और महिला शौचालय का अगर औचक निरिक्षण करा लिया जाए तो सच सामने आ जाएगा। महिला संस्थानों के एकल पदों पर तैनात महत्वपूर्ण कर्मचारियों—आलोक रंजन, पूजा सक्सेना, विकल्प कुमार सिंह, प्रवीण कुमार (कर्मशाला अधीक्षक) और अशोक पाण्डेय (विभागाध्यक्ष)—को उनके मूल संस्थानों से हटाकर जीकप में संबद्ध कर लिया गया है।
इंटीरियर डिजाइन एंड डेकोरेशन विभाग के विभागाध्यक्ष जितेंद्र मौर्य का मामला भी प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है। पिछले 7 -8 वर्षों से बिना कार्य के लाखों रुपए वेतन लेने वाले विभागाध्यक्ष जितेंद्र मौर्य ,महिला पॉलिटेक्निक में इस शाखा का पद खाली होने और छात्रों के शिक्षण का कार्य नहीं कर रहें और ,दुसरे विभाग से आये हुए इनको पांच वर्ष हो गए और आने के बाद भी इनको कहीं भी तैनाती नहीं दी गई इनके सरपरस्त संजीव सिंह हैं।
विभाग में चर्चा है की अगर किसी को लखनऊ में सम्बद्ध होना हो तो संजीव सिंह और विकल्प सिंह से सेटिंग कर ले क्यूंकि दोनों का रैकेट , पैसे लेकर सम्बद्ध कराने का। प्रवेश परीक्षा परिषद् में सम्बद्ध लोगों एवं कंप्यूटर सेल के कार्यो की अगर जांच कर ली जाए तो शासन को स्वयं पता चल जाएगा। इस पूरे अवैध वसूली रैकेट और संबद्धीकरण सिंडिकेट पर तकनीकी शिक्षा विभाग को प्रभावित करने के आरोप हैं।
शासन की मंशा और भ्रष्ट तंत्र की कार्यप्रणाली
एक तरफ प्रदेश सरकार सुशासन, जीरो टॉलरेंस और विकास के नित नए आयाम गढ़ने का दावा कर रही है, वहीं दूसरी तरफ ऐसे मामलों से सरकार की छवि धूमिल हो रही है।
एक तरफ समाज आदिशक्ति के पूजन और महिला उत्थान की बात कर रहा है, वहीं राजधानी लखनऊ के महिला पॉलिटेक्निक संस्थानों में छात्राओं के भविष्य को प्रभावित करने वाली व्यवस्थाओं पर रोक लगाने के लिए कड़े कदम उठाने की आवश्यकता है।
उच्च स्तरीय जाँच की माँग: संपत्तियों और घोटालों का हो पर्दाफाश
प्राविधिक शिक्षा विभाग की गरिमा को पुनर्जीवित करने के लिए निम्नलिखित बिन्दुओं पर आर-पार की लड़ाई की माँग उठ रही है:
विजिलेंस और ईओडब्ल्यू जाँच: संजीव सिंह और आजमगढ़ के निजी संस्थानों के बीच के संबंधों तथा बेनामी संपत्तियों की उच्च स्तरीय जाँच तुरंत बैठाई जानी चाहिए।
फंड के दुरुपयोग की जाँच: जीकप के फंड से अधिकारियों को दी जा रही सुविधाओं और व्यय की स्वतंत्र ऑडिट कराई जाए।
प्रमुख सवाल: क्या शासन-प्रशासन इस दोहरे प्रभार की आड़ में सक्रिय तत्वों पर कठोरतम कार्रवाई की हिम्मत जुटाएगा, या फिर महिला संस्थानों और छात्राओं के हितों की अनदेखी होती रहेगी?





