प्राविधिक शिक्षा विभाग: नियमों की धज्जियां उड़ाकर DPC कराने पहुंचे चहेते अफसर, लखनऊ से लेकर आयोग तक भारी ‘सेटिंग’!
लाभार्थी अफसर खुद DPC प्रस्ताव लेकर पहुंचे प्रयागराज; धन-बल और रसूख के दम पर नियम-कानूनों का बनाया गया मज़ाक

अनिल तिवारी, बेबाक पत्रकार
लखनऊ : उत्तर प्रदेश के प्राविधिक शिक्षा विभाग में नियमों को ताक पर रखकर चहेतों को फायदा पहुँचाने का खेल रुकने का नाम नहीं ले रहा है। पहले प्रकाशित हमारी रिपोर्ट में जिस अंदेशे और नियमों के तोड़े-मरोड़े जाने का खुलासा किया गया था, अब विभाग में ठीक वैसा ही घटित हो रहा है। ताज़ा घटनाक्रम में नियमों और प्रशासनिक मर्यादाओं की जो धज्जियां उड़ाई गई हैं, उससे पूरा विभाग अचंभित है।
जब सैंया भये कोतवाल, तो डर काहे का!
विभाग के एक चहेते अधिकारी का रसूख इस कदर सिर चढ़कर बोल रहा है कि वह खुद विभागीय पदोन्नति समिति (DPC) का प्रस्ताव लेकर मंगलवार दिनाँक 22/09/2026 को उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग, प्रयागराज पहुंच गए! प्रशासनिक नियमों के मुताबिक जिस प्रक्रिया का प्रत्यक्ष लाभार्थी कोई अधिकारी हो, उसे उस पूरी प्रक्रिया से पूरी तरह दूर रहना चाहिए। लेकिन यहाँ नियम केवल साधारण कर्मचारियों के लिए रह गए हैं।
हैरानी की बात यह है कि जिन निदेशक महोदय की जिम्मेदारी इन गलत गतिविधियों पर रोक लगाने की थी, वह स्वयं इन साहब की चाटुकारिता में व्यस्त नजर आ रहे हैं।
इतिहास में पहली बार: पूरा अमला उतरा मैदान में
प्राविधिक शिक्षा विभाग के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है जब DPC का प्रस्ताव लेकर निदेशालय का पूरा अमला ही प्रयागराज पहुँच गया। अमूमन DPC की तारीख तय होने के बाद जारी आदेश के अनुपालन में निदेशक और अन्य अधिकारी जाते है इसके पूर्व केवल केवल शासन स्तर का अनुभाग अधिकारी (Section Officer) किसी प्रश्न या शंका (Query) के समाधान के लिए जाता है।
परन्तु यहाँ तो:
खुद निदेशक महोदय,स्थापना प्रभारी सूरज गुप्ता, अतुल गुप्ता, तथा अन्य विभागाध्यक्ष सब मिलकर प्रयागराज आयोग के चक्कर काटते दिखे। इस प्रक्रिया का सीधा लाभार्थी अधिकारी भी इस दल का हिस्सा था, जो नियमों के पूर्णतः विपरीत है। निदेशक महोदय का ये कृत्य ये सिद्ध करता है कि क्यों वो इस पद के लायक नहीं है और जोड़ तोड़ के यहाँ नियम विरुद्ध चार्ज लेकर काबिज है।
साम, दाम, दंड, भेद और ‘2.5 लाख’ प्रति लाभार्थी का खेल
सूत्रों से मिली पुख्ता जानकारी के मुताबिक, इस नियमविरुद्ध DPC को हरी झंडी दिलवाने के लिए साम, दाम, दंड, भेद का जमकर इस्तेमाल हुआ है।
मंत्री जी का दबाव: विभागीय मंत्री जी द्वारा लगातार प्रशासनिक अमले पर दबाव बनाए रखा गया, ताकि उनके पसंदीदा अफसरों को प्रमोशन की सीढ़ियां चढ़ने में कोई रुकावट न आए।
लखनऊ में जुटा भारी चंदा: खबर है कि इस पूरे खेल के लिए लखनऊ में प्रति उम्मीदवार (लाभार्थी) 2.5 लाख रुपये का चंदा इकट्ठा किया गया। इसमें से 1.5 लाख रुपये प्रति लाभार्थी के हिसाब से शासन के एक उच्च अधिकारी तक पहुंचाए गए। इसी लेन-देन के दम पर अयोग्य व नियमों में न आने वाले कैंडिडेट्स के नाम भी सूची में आगे बढ़ा दिए गए।
अयोग्य चेहरों को आगे बढ़ाने की खुली साजिश
जैसा कि हमारी खोजी टीम ने पहले ही अंदेशा जताया था, नियमों को दरकिनार कर अयोग्य अधिकारियों की राह आसान की जा रही है:
आत्म प्रकाश सिंह: आवश्यक “डिप्लोमा स्तर के शिक्षण” की अनिवार्य योग्यता न होने के बाद भी इन्हें लाभ दिया जा रहा है।
लाल जी पटेल, जोखू लाल पटेल: आयु सीमा की शर्तों को पूरा न करने के बावजूद इनका नाम सूची में आगे बढ़ाया गया।
अन्य अधिकारी: जो विभागाध्यक्ष श्रेणी-2 की पात्रता में नहीं आते, उनके नाम भी सेटिंग के जरिए आगे कर दिए गए हैं।
मुख्यमंत्री जी से छिपाकर ‘चोरी-छिपे’ हो रही कार्रवाई
कार्मिक विभाग के विषय विशेषज्ञों और विधि विशेषज्ञों से इस बाबत तकनीकी जानकारी ली, तो स्पष्ट हुआ कि शासन चाहे तो शिथिलता (Relaxation) दे सकता है, लेकिन उसके लिए नियमानुसार फाइल चलाकर माननीय मुख्यमंत्री जी से लिखित अनुमति/अनुमोदन लेना अनिवार्य होता है।
मंत्री जी और विभागीय सिंडिकेट को भली-भांति पता था कि प्रदेश के सख्त और ईमानदार मुख्यमंत्री जी इस तरह के फर्जीवाड़े और नियम-विरुद्ध ढील की अनुमति कभी नहीं देंगे। इसीलिए पूरी प्रक्रिया को चोरी-छिपे और नियमों को मरोड़कर अंजाम दिया जा रहा है।
बड़ा सवाल:
अब देखने वाली बात यह होगी कि जीरो टॉलरेंस की नीति पर काम करने वाले माननीय मुख्यमंत्री जी इस पूरे मामले का संज्ञान लेकर इसकी उच्च स्तरीय जांच कब और कैसे करवाते हैं, ताकि प्राविधिक शिक्षा विभाग में चल रहे इस धन-बल और भ्रष्टाचार के खेल पर लगाम लग सके!





