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महा-खुलासा: ‘ओबीसी आरक्षण’ के अलंबरदार ही निकले असली विरोधी!

मुख्यमंत्री पर सवाल उठाने वाले कैबिनेट मंत्री आशीष पटेल और सांसद अनुप्रिया पटेल का दोहरा चेहरा बेनकाब; प्राविधिक शिक्षा विभाग बना 'कुर्मी सिंडिकेट' और अवैध कमाई का अड्डा!

  • प्राविधिक शिक्षा विभाग में सजातीय मलाई, दलित-पिछड़ों का ‘महा-उत्पीड़न

अनिल तिवारी, बेबाक पत्रकार


विशेष समाचार ब्यूरो, लखनऊ। राजनीति में पाखंड की सीमाएं जब टूटती हैं, तो सामाजिक न्याय का सबसे बड़ा ढोल पीटने वाले ही सबसे बड़े शोषक साबित होते हैं! उत्तर प्रदेश में ‘अपना दल (एस)’ की राष्ट्रीय अध्यक्ष व केंद्रीय मंत्री अनुप्रिया पटेल और उनके पति, प्रदेश के प्राविधिक शिक्षा मंत्री आशीष पटेल द्वारा बार-बार पत्र लिखकर व सार्वजनिक बयानबाज़ी करके उत्तर प्रदेश के यशस्वी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी पर “ओबीसी एवं एससी-एसटी विरोधी” होने का झूठा आरोप मढ़ा जाता रहा है। साक्षात्कारों और भर्तियों में पिछड़ों-दलितों की उपेक्षा का रोना रोने वाले इन माननीयों का असली चेहरा तब बेनकाब होता है, जब इनके नियंत्रण वाले प्राविधिक शिक्षा विभाग की परतें उघड़ती हैं।

हमारे समाचार पत्र द्वारा किए जा रहे शृंखलाबद्ध खुलासों में यह कड़वा सच सामने आया है कि मंत्री जी के लिए “ओबीसी” का मतलब केवल उनका सजातीय ‘कुर्मी समाज’ है। अन्य ओबीसी वर्गों, अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) समुदाय के योग्य अधिकारियों के लिए इनके मन में कोई स्थान नहीं है। प्राविधिक शिक्षा विभाग में जारी अवैध तबादले, पोस्टिंग, नियम-विरुद्ध अटैचमेंट, DPC का खेल और वसूली तंत्र इसका जीता-जागता प्रमाण हैं।

‘कुर्मी सिंडिकेट’ को मनचाही मलाई, दलित व आदिवासी अफसरों को सुदूर फेका

विभाग में इस वर्ष हुए स्थानांतरण और पदस्थापना में गैर-सजातीय और SC/ST अधिकारियों का जिस क्रूरता के साथ दमन किया गया, उसके प्रमुख उदाहरण निम्नलिखित हैं:

कानपुर पॉलिटेक्निक को किया अनाथ: अपनी निष्ठा और दिन-रात की मेहनत से कानपुर पॉलिटेक्निक को प्रदेश का नंबर-1 संस्थान बनाने वाले प्रधानाचार्य मुकेश आनंद को केवल इसलिए प्रदेश के दूसरे कोने (सोनभद्र) भेज दिया गया क्योंकि वे सजातीय नहीं एस सी समुदाय के थे। कानपुर जैसी अति-महत्वपूर्ण संस्था को प्रिंसिपल-विहीन कर दिया गया, ताकि मंत्री जी के खास अफसर श्री ए.पी. सिंह (कुर्मी) के लिए जगह खाली रखी जा सके—जिनकी DPC कराने के लिए शासन-प्रशासन के सभी नियमों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं।

मिर्जापुर से श्रावस्ती तक प्रताड़ना: मंत्री जी के अपने संसदीय/चुनावी क्षेत्र मिर्जापुर में जी-तोड़ मेहनत करने वाले एस टी (आदिवासी ) समुदाय के अफसर श्री बसंत लाल जी को मंत्री जी की नाराजगी का शिकार होना पड़ा और उन्हें प्रदेश के दूसरे छोर श्रावस्ती भेज दिया गया।

एस सी समुदाय के अन्य अधिकारियों के साथ भेदभाव का कुछ उदाहरण:

अभिमन्यु प्रसाद (BTE बोर्ड): एस सी समुदाय के अभिमन्यु प्रसाद की पत्नी गंभीर किडनी रोग से पीड़ित हैं और उनका किडनी ट्रांसप्लांट हुआ है। शासनादेश में गंभीर बीमारी व ‘स्पाउस ग्राउंड’ (पति-पत्नी नीति) का स्पष्ट प्रावधान होने के बावजूद, मानवता को ताक पर रखकर उन्हें तुरंत बोर्ड से रिलीव कर दूर भेज दिया गया।

रश्मि सोनकर : वर्षों से पारदर्शी और मनोयोग से काम करने वाली अनुभवी महिला अधिकारी रश्मि सोनकर को बोर्ड परीक्षाओं के दौरान इसलिए तत्काल हटाया गया ताकि मंत्री जी के सजातीय अधिकारी को सेट किया जा सके।

रामरतन व दिनेश कुमार के साथ अन्याय: गंभीर बीमारी से जूझ रहे रामरतन के बार-बार गुहार लगाने के बाद भी उन्हें लखनऊ ट्रांसफर नहीं किया गया, जबकि प्रधानाचार्य व सचिवों के पदों पर अवैध अटैचमेंट चल रहा है। वहीं केमिकल विभागाध्यक्ष दिनेश कुमार ने रिक्त पदों पर पोस्टिंग मांगी तो जानबूझकर उन्हें बेहद दूर भेज दिया गया।

श्री एस.के. आजाद का नाम काटा: केमिकल विभागाध्यक्ष एस.के. आजाद की सर्व-योग्यता होने के बावजूद ‘प्रिंसिपल DPC’ की लिस्ट से उनका नाम जानबूझकर कटवा दिया गया, क्योंकि वे मंत्री जी के चहेते अफसर ए.पी. सिंह की चाटुकारिता नहीं करते थे।

कुंवर मृत्युंजय सिंह जो वर्षों से IRDT मे मेहनत से काम कर रहे थे एस सी समुदाय का होने के नाते उन्हें वहां से दुर्भावनाग्रस्त होकर हटा दिया गया। जबकि IRDT संस्थान में 80% पद खाली पड़े हैं।

रवींद्र कुमार (विभागाध्यक्ष, कंप्यूटर): ए.पी. सिंह के खिलाफ बोलने के कारण उन्हें सुदूर ललितपुर स्थानांतरित कर दिया गया।

सजातीय अधिकारियों पर मेहरबानी: स्थानांतरण होने के बावजूद

सजातीय अधिकारियों पर मेहरबानी: स्थानांतरण होने के बावजूद मंत्री जी के खास सजातीय श्री मानेंद्र आज भी लखनऊ बोर्ड कार्यालय में अंगद का पांव जमाए बैठे हैं। उनका कमरा और नेमप्लेट तक खाली नहीं हुआ है और वे अनधिकृत रूप से बोर्ड चला रहे हैं। वहीं उनके स्थान पर श्री अभिषेक पंकज (एस सी समुदाय) का स्थानांतरण बोर्ड में हो चुका है और उन्होंने पदभार भी ग्रहण कर लिया है, लेकिन वहां संबद्ध (Attached) सभी कुर्मी वर्ग के अधिकारियों ने मिलकर उन्हें साइडलाइन कर रखा है।

अन्य पीड़ित अधिकारी: इसी प्रकार एस के आज़ाद, दिनेश कुमार, राम रतन, राही, कुँवर मृत्युंजय, बृजेन्द्र कुमार, शैलेंद्र विक्रम, सुनील कुमार सोनकर, रश्मि सोनकर जैसे दर्जनों दलित-पिछड़े अधिकारियों को चुन-चुनकर निशाना बनाया गया है।

असंवैधानिक ‘विशेष तकनीकी सेल’ और मलाईदार अटैचमेंट का सिंडिकेट

स्थानांतरण नीति 2026 और मुख्यमंत्री जी के स्पष्ट निर्देशों की धज्जियां उड़ाते हुए विभाग में एक असंवैधानिक ‘विशेष तकनीकी सेल’ का गठन किया गया है। किसी भी सेवा नियमावली में इसका उल्लेख नहीं है, लेकिन सजातीय अफसरों को महानगरों में रखकर पठन-पाठन से दूर अवैध वसूली में लिप्त रखने के लिए यह तंत्र बनाया गया है।

महानगरों में जमे प्रमुख सजातीय (कुर्मी) संबद्ध अधिकारियों की सूची:

ये वे अधिकारी हैं जो लाखों रुपये सरकारी वेतन तो ले रहे हैं, लेकिन शैक्षणिक कार्यों से दूर रहकर राजनीति और वसूली सिंडिकेट का हिस्सा बने हुए हैं:

विकल्प कुमार सिंह: इनकी विभागध्यक्ष पद की पोस्टिंग की कहानी भी कमाल की है इनकी तैनाती ऐसी संस्था मे कर दी गयी जहाँ इनकी ब्रांच ही नहीं चलती है, क्योंकि उनको संस्था जाना ही नहीं (जैसे वो वर्षों से अपनी मूल संस्था नहीं गए) उन्हें तो हमेशा की तरह बोर्ड मे अटैच रहकर बस वसूली व राजनीति में लिप्त रहना है फील्ड में श्री विकल्प कुमार अपने को शासन के अधिकारिओं के खास लोगों में अपनी पहुच को बताते हैं|

अवधेश पटेल (विभागाध्यक्ष): अवैध संबद्धीकरण के सिरमौर,अटैचमेंट के लिए इन्ही के मार्फ़त काम होता ,निदेशक और मंत्री के बीच कड़ी का काम करते ।

कमल कुमार: ‘यूराइज पोर्टल’ के नाम पर वर्षों से लखनऊ में जमे थे। मंत्री जी ने अपना कार्यकाल पूरा होने के समय आता देखकर इन्हें प्राविधिक शिक्षा बोर्ड में संयुक्त सचिव के पद पर सेट कर दिया, किंतु आज भी अधिकतर समय मंत्री जी के कार्यालय में पाए जाते हैं विभाग के निदेशक से लेकर वरिष्ठ प्रधानाचार्य इनके आगे नतमस्तक रहते ।

ए.पी. सिंह (आत्म प्रकाश सिंह): विशेष कृपा पात्र; केवल लखनऊ-कानपुर के बीच संबद्ध।

पी के सिंह प्रधानाचार्य जो 20+ वर्षों से झाँसी में जमे हुए थे उन्हें पुनः झाँसी मंडल मे तैनात कर दिया गया ।

इंद्रजीत सचान: 20+ वर्षों से लखनऊ में अंगद की तरह जमे हुए हैं।

संदीप कुमार गंगवार (विभागाध्यक्ष, कंप्यूटर): पूरी सेवा बरेली में काटी; मात्र कुछ दिनों के लिए लखनऊ में जॉइन किया (जिसमें एक दिन भी कोई क्लास नहीं पढ़ाई) और वापस जुगाड़ बैठाकर बरेली चले गए।

जितेंद्र कुमार मौर्य (विभागाध्यक्ष, इंटीरियर डिजाइन): इनकी कहानी सबसे अनूठी है। विभाग में कोई नहीं जानता कि ये किस संस्था में तैनात हैं। दूसरे विभाग से प्रतिनियुक्ति से वापस आए इन्हें बरसों हो गए, लेकिन कर्मठ निदेशक और शासन के आला अधिकारी इनकी तैनाती किसी संस्था में नहीं कर पाए। वर्तमान में बिना काम किए, प्रमुख सचिव से भी ज्यादा वेतन उठाकर मजे काट रहे हैं।

अन्य कृपा पात्र कुर्मी अधिकारी: राम लोटन वर्मा, प्रभा शंकर आर्य, लालजी पटेल, प्रदीप कुमार, आर.के. पटेल, रोहित कटियार, एवं विनीत वर्मा।

नियम-विरुद्ध ‘अटैचमेंट महाघोटाला’ और भ्रष्टाचार के पुख्ता प्रमाण: विजय कुमार गुप्ता का अनोखा अटैचमेंट: अभिमन्यु प्रसाद (कर्मठ एवं डायनामिक दलित अधिकारी) को महाभारत के अभिमन्यु की तरह व्यूह रचना करके, प्रभारी सचिव और मंत्री महोदय ने षड्यंत्र रचकर ‘प्रशासनिक आधार’ बनाकर बोर्ड से हटा दिया। और प्रशासनिक आधार बनाकर उनकी जगह नियम-विरुद्ध तरीके से विजय कुमार गुप्ता (व्याख्याता, आई टी ) को अटैच किया गया।

माननीय मुख्यमंत्री जी और प्रमुख सचिव तक सूचना न पहुंचे, इसलिए प्राविधिक शिक्षा के इतिहास में पहली बार निदेशक महोदय द्वारा (आदेश संख्या: 26260-79, दिनांक 11 सितंबर 2026) बाकायदा पदनाम के साथ विजय गुप्ता, लेक्चरर IT, राजकीय पॉलिटेक्निक औराई को बोर्ड में सहायक प्राचार्य के पद पर अटैच कर दिया गया। चर्चा है कि मंत्री जी के सजातीय व संयुक्त सचिव कमल कुमार ने अपनी ब्रांच के गुप्ता जी को बोर्ड में लाने में विशेष योगदान दिया। अब विभाग में पद पर अटैचमेंट की नई परंपरा शुरू हो रही है।
विभागीय कार्रवाइयों में दोहरा रवैया: सजातीयों को अभयदान, दूसरों पर गाज!

विभागीय अनुशासनहीनता और आपराधिक मामलों में भी मंत्री जी का जातिवादी चश्मा साफ नजर आता है:

प्रवेश वर्मा (मोहम्मदी, लखीमपुर): कार्यवाहक प्रधानाचार्य प्रवेश वर्मा पर पेड़ चोरी करने, छात्राओं व महिला अधिकारियों के उत्पीड़न के संगीन आरोप हैं। जांचकर्ता प्रधानाचार्य एवं संयुक्त निदेशक (मध्य क्षेत्र) ने अपनी जांच में इन्हें शत-प्रतिशत दोषी पाया और तुरंत निलंबित करने की संस्तुति की थी। लेकिन कुर्मी समाज से होने के कारण मंत्री जी ने फाइल दबा दी और वे आज भी सबूत मिटाने के लिए पद पर बरकरार हैं।

राकेश कुमार पटेल (कौशांबी): प्रधानाचार्य राकेश कुमार पटेल पर महिलाओं के यौन शोषण के अति-गंभीर आरोप लगे। कौशांबी के जिलाधिकारी (DM) ने कठोर कार्रवाई हेतु शासन को पत्र लिखा और पूरी संस्था के कर्मचारी त्रस्त हैं, लेकिन सजातीय होने के कारण इन पर आज तक कोई आंच नहीं आई।

आर.बी. सिंह बनाम अन्य प्रवक्ता: मंत्री जी के पूर्व OSD आर.बी. सिंह (प्रधानाचार्य) ने सरकार की घोर विरोधी पार्टी की विधायक पल्लवी पटेल के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस की और सरकार के खिलाफ जहर उगला, लेकिन कुर्मी होने के कारण उन पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। इसके विपरीत, मात्र मीडिया में सामान्य साक्षात्कार देने पर दो प्रवक्ताओं—भोलेनाथ प्रसाद एवं गजेंद्र लोधी को तत्काल निलंबित कर उनका इंक्रीमेंट रोक दिया गया और उनका उत्पीड़न लगातार ज़ारी है!

श्याम नारायण सिंह, प्रधानाचार्य: महिला संस्था मे छात्राओं के खिलाफ़ आचरण के कारण निलंबित होने के बाद बिना कार्यवाही के इन्हे लखनऊ जैसी महत्वपूर्ण संस्था का प्रधानाचार्य बना दिया गया।

राजन सिंह व जान बेग लोनी पर कार्रवाई: कासगंज के प्रधानाचार्य श्री राजन सिंह (SC समुदाय) को सामान्य शिकायत पर तुरंत निलंबित कर दिया गया (अंततः वे हाई कोर्ट के आदेश से बहाल हो सके)। वहीं गाजियाबाद के प्रधानाचार्य श्री जान बेग लोनी को भी षड्यंत्र रचकर हटा दिया गया, जिनकी तारीफ सभी प्रमुख सचिव अपनी विभागीय बैठकों में करते रहे हैं।

वर्तमान स्थिति: लखनऊ का बोर्ड ऑफिस, प्रवेश परीक्षा कार्यालय, जेडी कार्यालय और स्वयं शासन का कार्यालय अटैचमेंट के लोगों (जैसे पूजा सक्सेना ,वर्षा यादव ,सुमित गुप्ता,आलोक रंजन ,विनीत वर्मा ,राहुल सिंह,आकाश शर्मा जैसे अनगिनत लोग अटैचमेंट की मलाई खा रहें और जनता के टैक्स का लाखों रुपया कामचोर अधिकारियों पर खर्च हो रहा है और गरीब छात्र पढ़ाई से वंचित हो रहे हैं।संस्थाओ के अन्य सहयोगी लेक्चरर और हेड में भी कुंठा है की निदेशालय ,शासन-प्रशासन से मांगी जाने वाली रिपोर्ट्स को भी उनको तैयार करना पड़ता है |)

जनता की अदालत में बड़ा सवाल

जो माननीय मंत्री और उनकी सांसद पत्नी दिन-रात मंचों से चिल्ला-चिल्लाकर उत्तर प्रदेश सरकार और माननीय मुख्यमंत्री जी की नीतियों पर ‘ओबीसी विरोधी’ होने का कीचड़ उछालते हैं, उनके खुद के विभाग का यह सच रोंगटे खड़े करने वाला है। छात्र-छात्राओं का भविष्य अंधकार में धकेला जा रहा है, गरीब बच्चों की पढ़ाई ठप्प है और पूरा प्राविधिक शिक्षा विभाग ‘जातिवादी सिंडिकेट’ और ‘उगाही केंद्र’ में तब्दील हो चुका है।

अब देखना यह है कि क्या माननीय मुख्यमंत्री जी इस पूरे संगठित भ्रष्टाचार पर कड़ा संज्ञान लेते हुए इस ‘अटैचमेंट सिंडिकेट’ का अंत करेंगे? या निष्पाप दलित-पिछड़े अधिकारी इसी तरह प्रताड़ित होते रहेंगे?

माननीय मुख्यमंत्री महोदय—जो सदैव जाति व्यवस्था के विरोधी रहे हैं और ‘सबका साथ, सबका विकास’ का संदेश देते हैं—क्या प्रदेश को इस भ्रष्ट सिंडिकेट से मुक्ति दिला पाएंगे? समस्त दलित-वंचित समुदाय की माननीय मुख्यमंत्री जी से अपील है कि उपरोक्त गंभीर बिंदुओं की जांच किसी निष्पक्ष बाहरी एजेंसी से कराई जाए, अन्यथा आगामी चुनावों में इसका व्यापक असर देखने को मिल सकता है।

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