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एक्सक्लूसिव रिपोर्ट: प्राविधिक शिक्षा विभाग में नियमों की बलि, मंत्री जी के ‘खास’ को बिन पात्रता प्रोमोशन देने की तैयारी!

लखनऊ। उत्तर प्रदेश के प्राविधिक शिक्षा विभाग में नियम-कानूनों को ताक पर रखकर चहेते अधिकारियों पर मेहरबानी का एक नया मामला सामने आया है। महकमे के कर्ता-धर्ताओं की छत्रछाया में एक ही अधिकारी पर मेहरबानियों की ऐसी बारिश हो रही है कि योग्यता और सेवा नियमावली दरकिनार कर दी गई है। चर्चा है कि मंत्री आशीष पटेल के एक करीबी अधिकारी को बिना जरूरी अर्हता के प्रधानाचार्य पद (DPC) पर प्रमोट करने का ताना-बाना बुना जा चुका है।

मामा OSD, फिर नियमों की परवाह किसे?
विभाग के गलियारों में सुगबुगाहट है कि इस पूरे खेल का रिमोट कंट्रोल राजनीतिक और प्रशासनिक रसूख के पास है। सूत्र बताते हैं कि संबंधित अधिकारी ए.पी. सिंह के सगे मामा स्वयं मंत्री जी की धर्म पत्नी एवं केंद्रीय मंत्री माननीय अनुप्रिया पटेल जी के विशेष कार्य अधिकारी (OSD) के पद पर तैनात हैं। इसी भारी-भरकम ‘मामा श्री’ के प्रभाव के चलते शासन और निदेशालय के आला अधिकारी नियमों की अनदेखी कर हर फाइल पर झटपट मुहर लगा रहे हैं।

16 साल का अनुभव कागजों में गायब, फिर भी लिस्ट में टॉप पर नाम

शासनादेश और सेवा नियमावली के मुताबिक प्रधानाचार्य पद की पदोन्नति के लिए कम से कम 16 वर्ष का अध्यापन (Teaching) अनुभव mandatory है। हालांकि, अधिकारी के सर्विस रिकॉर्ड कुछ और ही कहानी बयां कर रहे हैं:

  • कुल सेवा काल: लगभग 21 वर्ष 6 माह
  • वास्तविक टीचिंग अनुभव: मात्र 9 वर्ष 5 माह 26 दिन
  • नॉन-टीचिंग/प्रशासनिक अनुभव: 12 वर्ष 18 दिन
  • कागजात गवाह हैं कि इनकी अधिकांश सेवा

सचिवालय प्रशिक्षण, उपनिदेशक प्रा०शि०नि० और IRDT जैसे प्रशासनिक (नॉन-टीचिंग) पदों पर बीती है। अनिवार्य 16 साल की शैक्षणिक सेवा पूरी न होने के बावजूद कई वरिष्ठ और योग्य अध्यापकों को पछाड़कर इनका नाम पदोन्नति सूची में सबसे ऊपर दर्ज कर लिया गया है।

‘सुपरफास्ट’ PhD: 1 साल में डॉक्टर बनने का अनूठा कारनामा

पदोन्नति के खेल के बीच अधिकारी की पीएचडी (PhD) की डिग्री पर भी सवाल खड़े हो गए हैं।

  • अधिकारी के रिकॉर्ड के अनुसार उनकी PhD वर्ष 2020 में पूरी हुई।
  • जबकि संबंधित यूनिवर्सिटी में यह शोध कार्यक्रम 2019 में शुरू ही हुआ था।

सामान्य तौर पर किसी मेधावी छात्र को भी पीएचडी पूरी करने में 3 से 4 साल का समय लगता है। ऐसे में महज 12 महीने के भीतर डिग्री हासिल कर लेना किसी ‘चमत्कार’ से कम नहीं माना जा रहा।

मलाईदार पोस्टिंग का अनोखा पैटर्न

| संस्थान / पद | कार्य अवधि (प्रशासनिक/नॉन-टीचिंग) |
|—|—|
| सहायक प्राचार्य, IRDT कानपुर | 08.08.2012 – 11.09.2012 |
| सचिवालय प्रशिक्षण, लखनऊ | 27.09.2013 – 06.06.2018 |
| उपनिदेशक, प्रा०शि०नि० (पहला कार्यकाल) | 07.06.2018 – 25.09.2018 |
| उपनिदेशक, प्रा०शि०नि० (दूसरा कार्यकाल) | 03.07.2019 – 01.07.2022 |
| उपनिदेशक, IRDT | 02.07.2022 – 16.06.2026 |
| उपनिदेशक, प्रा०शि०नि० (वर्तमान) | 17.06.2026 से निरंतर |

प्रथम श्रेणी के अधिकारियों को आमतौर पर निदेशालय में बार-बार तैनाती नहीं मिलती, लेकिन कानपुर से लखनऊ के बीच ‘अटैचमेंट खेल’ के सहारे इन्होंने अपनी अधिकतर नौकरी बिना पढ़ाए ही काट ली।
महकमे में आक्रोश, सरकार के रुख पर टिके नजरें
तबादले और सम्बद्धीकरण में पहले भी चहेतों को संरक्षण देने के आरोप उठते रहे हैं। विभागीय सूत्रों की मानें तो वर्तमान निदेशक भी प्रशासनिक दबाव में आकर नियमों को शिथिल करने में जुटे हैं। इस ‘विशेष अनुकंपा’ से योग्य व वरिष्ठ शिक्षकों में भारी निराशा और आक्रोश व्याप्त है। अब देखना यह होगा कि क्या शासन इस गड़बड़ी पर नकेल कसता है या नियम यूँ ही रसूख के आगे घुटने टेकते रहेंगे।

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