महा-खुलासा: खुद इंजीनियर मंत्री जी के राज में प्राविधिक शिक्षा की रीढ़ टूटी — ‘जीरो परफॉर्मेंस’ और अवैध अटैचमेंट सिंडिकेट का कड़वा सच!

अनिल तिवारी, बेबाक पत्रकार
लखनऊ। उत्तर प्रदेश का प्राविधिक शिक्षा विभाग इन दिनों नई तकनीक या इनोवेशन के लिए नहीं, बल्कि महा-भ्रष्टाचार, अव्यवस्था और नियमों की धज्जियां उड़ाने के लिए सुर्खियों में है। हैरानी की बात यह है कि विभाग की कमान स्वयं एक इंजीनियरिंग ग्रेजुएट मंत्री श्री आशीष पटेल जी के हाथों में है। इसके बावजूद, प्राविधिक शिक्षा विभाग वेंटिलेटर पर अंतिम सांसें गिन रहा है और मंत्री जी की परफॉर्मेंस ‘शून्य’ साबित हो रही है।
अखबारों में छपी खोजी रिपोर्टों और विभागीय दावों के आधार पर यह साफ हो चुका है कि विभाग में एक संगठित सिंडिकेट हावी है, जो मनचाही पोस्टिंग, अवैध अटैचमेंट (संबद्धीकरण) और नियमों में फेरबदल कर मलाई काट रहा है।
1. अटैचमेंट सिंडिकेट: मंत्री जी के चहेते अफसरों का राज और अवैध अटैचमेंट का खेल
विभाग में सबसे बड़ा खेल अवैध संबद्धीकरण (Attachment) का चल रहा है। दूरस्थ और ग्रामीण क्षेत्रों की पॉलीटेक्निक संस्थाओं के प्रवक्ताओं और विभागाध्यक्षों को कागजों पर तो वहीं पदस्थ दिखाया गया है, लेकिन वे लखनऊ और कानपुर जैसे महानगरों के मुख्यालयों में अटैच होकर बाबूगिरी कर रहे हैं और ढाई-ढाई लाख रुपये तक वेतन उठा रहे हैं।
नियमों को तोड़ने के मुख्य किरदार और मंत्री के चहेते अवसर:
आत्म प्रकाश सिंह (विभागाध्यक्ष): मंत्री जी के खास चहेते अफसर के रूप में पहचाने जाने वाले आत्म प्रकाश सिंह पर नियमों की धज्जियां उड़ाने, अवैध संबद्धीकरण, दोहरे चार्ज और विशेष तकनीकी सेल के नाम पर करोड़ों रुपये की सैलरी का बंदरबांट करने के गंभीर आरोप हैं। नियमों को तोड़कर चहेतों को लाभ पहुंचाना इस सिंडिकेट की पहचान बन चुका है।
समाचार पत्रों में उजागर अटैचमेंट सिंडिकेट के सभी नाम और उनका कड़वा सच:
प्रवीन कुमार (कर्मशाला अधीक्षक): राजकीय महिला पॉलीटेक्निक लखनऊ में एकल पद पर कार्यरत है और JEECUP मे सालो से सम्बद्ध है।
मुरलीधर पाण्डेय (इलेक्ट्रीशियन): राजकीय महिला पॉलीटेक्निक लखनऊ में एकल पद पर कार्यरत है और JEECUP मे सालो से सम्बद्ध है।
संजीव सिंह (प्रधानाचार्य): राजकीय महिला पॉलीटेक्निक लखनऊ में एकल पद पर रहते हुए जीकप (JEECUP) के सचिव का दोहरा प्रभार संभाल रहे हैं।
स्मिता सिंह (व्याख्याता इलेक्ट्रॉनिक्स): मूल संस्था राजकीय पॉलीटेक्निक हरदोई है (जहाँ केवल 2 पद स्वीकृत हैं), लेकिन वे लखनऊ में सम्बद्ध हैं, जिससे हरदोई में मात्र एक ही प्रवक्ता बचा है।
विकल्प कुमार सिंह (विभागाध्यक्ष कंप्यूटर): राजकीय महिला पॉलीटेक्निक प्रयागराज (एकल पद) से BTEUP लखनऊ में सम्बद्ध हैं। खास बात यह है कि प्रयागराज की इस संस्था में संबंधित कंप्यूटर ब्रांच संचालित ही नहीं होती!
कुलदीप श्रीवास्तव (विभागाध्यक्ष आर्किटेक्चर): राजकीय महिला पॉलीटेक्निक चरखारी (महोबा) के एकल पद से सम्बद्ध हैं। यहाँ भी खास बात यह है कि इस संस्थान में संबंधित आर्किटेक्चर ब्रांच संचालित ही नहीं हो रही है!
अवधेश पटेल (विभागाध्यक्ष): राजकीय महिला पॉलीटेक्निक झाँसी मे तैनाती लेकिन विशेष तकनीकी सेल और अटैचमेंट सिंडिकेट के मुख्य चेहरों में शामिल, दूरस्थ संस्थाओं के दोहरे चार्ज पर सुविधा शुल्क वसूली के आरोप।
आत्म प्रकाश सिंह (उपनिदेशक): निदेशालय/मुख्यालय में, जो हमेशा ही लखनऊ कानपुर सम्बद्ध रहते है, रहकर प्रशासनिक कार्यों के नाम पर जमे हुए नियमों की धज्जियाँ उडाने मे लगे हुए है और नियमविरुद्ध खिचड़ी नियमावली से डीपीसी करा रहे है।
आलोक कुमार (बलिया): मूल संस्था से इतर महानगरों में अटैचमेंट का मजा ले रहे हैं।
आकाश शर्मा (शाहजहांपुर): अटैचमेंट सिंडिकेट के तहत स्थानांतरित होकर अपनी मूल संस्था का मुंह तक नहीं देख रहे।
अतुल राज (कानपुर): मूल संस्था में पढ़ाई ठप करके लखनऊ/कानपुर मुख्यालयों में सम्बद्ध।
सुमित कुमार (कानपुर): अटैच होकर क्लर्क का काम कर रहे हैं।
राहुल सिंह (बलिया): अटैचमेंट के बल पर अपनी मूल संस्था से गायब।
विवेकानंद: अटैचमेंट उद्योग का लाभ उठाकर मुख्यालय में जमे हुए।
पूजा सक्सेना (हेतमपुर): पूर्व में निरस्त आदेशों के बाद भी नए सिंडिकेट के सहारे अटैचमेंट पर कायम।
अतुल राज : महानगरों की संस्थाओं में सम्बद्ध होकर वेतन उठा रहे हैं।
विनीत वर्मा: अटैचमेंट सिंडिकेट के तहत महानगरों में कार्यरत।
सुनील कुमार (बलिया): बलिया और आजमगढ़ का प्रभार/अटैचमेंट लेकर मलाई काट रहे हैं।
कमाल की बात यह है किसी भी प्रधानाचार्य को इस बात की चिंता नहीं है वह कभी भी इन अटैचेद कर्मचारियों के लिए कोई पत्र निर्देशक या शासन को नहीं लिखते हैं। इस सिंडिकेट की जड़े बहुत ही गहरी है।
2. महिला पॉलिटेक्निकों की दुर्दशा और अटैचमेंट का अभिशाप
महिला पॉलिटेक्निक संस्थाओं के लिए यह अवैध अटैचमेंट एक बहुत बड़ा अभिशाप बन चुका है। देखने में आया है कि लगभग सभी महिला पॉलिटेक्निकों का ज्यादातर शैक्षणिक एवं तकनीकी स्टाफ अटैचमेंट पर ही चल रहा है।
सबसे दुखद बात यह है कि इनमें से बहुत से कर्मचारी/अधिकारी अपनी संस्थाओं में एकल पद (Single Post) पर तैनात थे। उनके हटने और महानगरों में सम्बद्ध हो जाने के बाद संस्था में उनका कोई विकल्प ही उपलब्ध नहीं है। इसके कारण महिला पॉलिटेक्निकों में कक्षाएं और व्यावहारिक प्रयोगशाला कार्य (Practicals) पूरी तरह से ठप हो चुके हैं और बेटियों का भविष्य पूरी तरह से अंधकारमय हो गया है।
3. AI और डिजिटल इंडिया के दौर में अटैचमेंट का ढोंग क्यों?
आज जब देश आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), मशीन लर्निंग और डिजिटल टेक्नोलॉजी के दौर में तेजी से आगे बढ़ रहा है और सारे प्रशासनिक काम ऑनलाइन हो रहे हैं, तो प्राविधिक शिक्षा विभाग में भौतिक अटैचमेंट (Attachment) की आवश्यकता ही क्यों पड़ रही है? यह बात आम जनता और बुद्धिजीवियों की समझ से परे है!
जब देश के माननीय प्रधानमंत्री जी और प्रदेश के माननीय मुख्यमंत्री जी दर्जनों बैठकें, समीक्षाएं, उद्घाटन और संबोधन ऑनलाइन वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से आसानी से कर सकते हैं, तो प्राविधिक शिक्षा विभाग के ये अधिकारी और कर्मचारी संस्थाओं में बैठकर ऑनलाइन काम क्यों नहीं निपटा सकते? साफ है कि काम का बहाना बनाकर महानगरों में ऐश करने और सिंडिकेट चलाने के लिए ही यह ‘अटैचमेंट उद्योग’ रचा गया है।
4. मूलभूत विषय (Physics, Chemistry, Maths, English) गायब — कैसे बन रहे हैं इंजीनियर?
इंजीनियरिंग की नींव माने जाने वाले मूलभूत विषयों—फिजिक्स, केमिस्ट्री, मैथ्स और इंग्लिश—की स्थिति अत्यंत चिंताजनक है। प्रदेश के अधिकांश पॉलीटेक्निक संस्थानों में इन मूलभूत विषयों के शिक्षकों के पद ही सृजित नहीं हैं, और जहाँ हैं भी, वहाँ मुश्किल से एकाध पद ही सृजित किया गया है!
लखनऊ, कानपुर, गाजियाबाद, प्रयागराज, उन्नाव, बाराबंकी, अयोध्या और गोरखपुर जैसी प्रमुख संस्थाओं तक में यही बदहाली है। जब इंजीनियरिंग की बुनियाद तैयार करने वाले मुख्य विषयों के शिक्षक ही नहीं होंगे, तो इन संस्थानों में पढ़ाई कैसे होती होगी? यह एक अत्यंत सोचनीय और गंभीर विषय है कि बिना बेसिक साइंस और लैंग्वेज के छात्र-छात्राएं कैसी इंजीनियरिंग की डिग्री/डिप्लोमा ले रहे हैं!
इसके अलावा भीलहिली (आजमगढ़), महिला पॉलीटेक्निक प्रयागराज, महोबा, बाराबंकी, कन्नौज, लखनऊ और कानपुर जैसे संस्थानों में कंप्यूटर, IT, इलेक्ट्रॉनिक्स और आर्किटेक्चर जैसी व्यावहारिक ब्रांचों में पद ही गायब हैं। वहीं महिला पॉलीटेक्निक अयोध्या में कंप्यूटर की केवल 1 ब्रांच होने के बावजूद विभागाध्यक्षों और लेक्चररों की पूरी फौज भरी पड़ी है!
5. खुद मंत्री जी के गृह जनपद मिर्ज़ापुर का बुरा हाल! ‘दीया तले अंधेरा’ की कहावत मंत्री जी के गृह जिले मिर्ज़ापुर में पूरी तरह चरितार्थ हो रही है:
राजकीय पॉलीटेक्निक मिर्ज़ापुर: यहाँ वर्ष 1984 से ‘इलेक्ट्रॉनिक्स’ और बाद में ‘IT’ ब्रांच चल रही है, प्रवेश भी पूरे हैं, लेकिन कमाल का सिस्टम है कि इन दोनों ब्रांचों में शिक्षक का एक भी पद स्वीकृत ही नहीं है!
चुनार और राजगढ़ (मिर्ज़ापुर): यहाँ प्रधानाचार्य और विभागाध्यक्षों के पद खाली पड़े हैं। बाउंड्रीवॉल तक नहीं है और हॉस्टल जर्जर हैं। मंत्री जी ने आज तक इन संस्थानों में कदम तक नहीं रखा है। जब गृह जिले का यह हाल है, तो प्रदेश का भगवान ही मालिक है!
6. छात्रावासों की दुर्दशा और सिर्फ ‘निर्माण’ में दिलचस्पी
विभाग की बैठकों में मंत्री जी 80% समय सिर्फ निर्माण कार्यों की समीक्षा पर देते हैं, 15-19% समय डिग्री सेक्टर को और डिप्लोमा (पॉलीटेक्निक) को महज 1% समय मिलता है। निर्माण कार्यों से मिलने वाले ‘फायदों’ की वजह से नई-नई इमारतें और छात्रावास (विशेषकर हाथरस, महोबा, कन्नौज, बाराबंकी, गोरखपुर जैसी प्रमुख संस्थाओं में) तो बना दिए गए हैं, लेकिन वे सालों से खाली पड़े हैं। गरीब बेटियां सुरक्षा के वातावरण से दूर, महंगे किराए पर बाहर रहने को मजबूर हैं। कन्नौज, बाराबंकी, अयोध्या में तो छात्रो को अपनी बिल्डिंग और शिक्षक भी नसीब नही हो रहे।
निष्कर्ष: मंत्री जी का रिजल्ट ‘शून्य’!
निदेशक से लेकर प्रधानाचार्य और व्याख्याताओं के मुख्य पद खाली पड़े हैं। जब पूरा ढांचा ही कामचलाऊ व्यवस्था से चल रहा हो, तो प्राविधिक शिक्षा का विकास कैसे हो सकता है? अखबारों के खुलासे के बाद शासन स्तर पर हलचल जरूर हुई है और जांच के आदेश दिए गए हैं, लेकिन इन ठोस परिस्थितियों के आधार पर देखा जाए तो प्राविधिक शिक्षा मंत्री जी का रिपोर्ट कार्ड पूरी तरह से ‘शून्य’ ही नजर आता है!





