वकालत और पत्रकारिता की आड़ में जालसाज़ी, धोखाघड़ी की कानूनी कार्यवाही से बचता रिटायर्ड PCS अधिकारी!
उत्तर प्रदेश में भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरा रहा रिटायर्ड अफसर दया शंकर, कई FIR के बाद भी कार्रवाई से दूर

- विशेष रिपोर्ट
उत्तर प्रदेश में भ्रष्टाचार में लिप्त प्रशासनिक अधिकारियों के कारनामे अक्सर उजागर होते रहते हैं, लेकिन रिटायर्ड PCS अधिकारी *दया शंकर* का मामला सबसे अलग है। आरोप है कि पद पर रहते हुए उनके द्वारा की गई वित्तीय अनियमितताओं और भ्रष्टाचार के किस्से किसी से छिपे नहीं हैं। दयाशंकर का चरित्र परिभाषित करने की आवश्यकता नही, निलंबन, पेंशन कटौती और दर्जनों मुकदमों के बाद, साप्ताहिक समाचार पत्र राष्ट्रीय जन सूचना अधिकार प्रकाशित किया जा रहा है ।18 जून 2004 को मुख्य विकास अधिकारी गाजीपुर के पद पर निलम्बित, 21 दिसम्बर 2009 को फर्जी भुगतान एवं गम्भीर अनियमितताओं का प्रथम दृष्टया दोषी पाये जाने के कारण निलम्बित, 20 जून 2013 को जिलाधिकारी के सम्मुख फर्जी शपथ पत्र प्रस्तुत करने के कारण आरोप पत्र ऽथाना कोतवाली, जिला गाज़ीपुर, अपराध सं. 1572/2004 ऽथाना हजरतगंज, अपराध सं. 140/10 ऽ थाना हजरतगंज, धारा 418, 419, 420, 467, 468, 471, 506 ऽ थाना गाज़ीपुर, अपराध सं. 62, धारा 420, 467, 468, 471 थाना गाज़ीपुर, अपराध सं. 63 धारा 506 ऽ थाना हजरतगंज, अपराध सं. 0499/17, ं शासकीय गुप्त वाद अधिनियम ऽथाना हजरतगंज में अपराध सं. 0601/18 धारा 420 ई.ओ.डब्लू./सतर्कता द्वारा मुकदमा दर्ज ।
उपरोक्त आरोपों के अनुसार, अपने काले कारनामों से जांच एजेंसियों को चकमा देकर आज भी भ्रष्टाचार से अर्जित अकूत संपत्ति के बलबूते वे समाज के सामने काले कोट (वकालत) और कलम (पत्रकारिता) का मुखौटा ओढ़कर सफेदपोश की जिंदगी जी रहे हैं। राष्ट्रीय जनसूचना अधिकार नामक साप्ताहिक समाचार पत्र के स्वामी, प्रकाशक, मुद्रक की भूमिका में दया शंकर द्वारा पुलिस की जांच एजेंसियों पर अपना प्रभुत्व जमाने की कोशिशों को काला रंग देने के लिए फ़र्ज़ी डिग्री के आधार पर बार कौंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश में।पंजीकृत कराकर कभी वकील तो कभी पत्रकार का दोहरा किरदार भी निभाया जाता है।
बीवी के नाम कर दी सरकारी कंपनी!
एक प्रमुख समाचार पत्र ने ‘बीवी के नाम कर दी सरकारी कंपनी’ शीर्षक से जब दया शंकर के कथित कारनामों का खुलासा किया तो सरकारी महकमे में हड़कंप मच गया। इसके बाद उन्हें निलंबित कर थाना हजरतगंज, लखनऊ में गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज कराया गया। आरोप है कि इस मामले में भी वे तकनीकी दांव-पेंच से बच निकले।
इसके बाद बेरोजगार युवकों को नौकरी दिलाने के नाम पर ठगी के आरोप में हजरतगंज में ही दूसरा मुकदमा दर्ज हुआ। आरोप है कि विभागीय मिलीभगत और धन-बल के चलते इस मामले में भी कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो सकी।
परिवार तक पर मुकदमे
सूत्रों के अनुसार, अपने नाम के विपरीत इस अधिकारी में न दया है और न शंकर जैसा चरित्र। आरोप है कि अपने रसूख को बनाए रखने के लिए वे परिवार, रिश्तेदारों तक को आगे कर देते हैं। इसी के चलते उनके साले, भतीजे, बहू, पत्नी और बेटे पर भी विभिन्न थानों में मुकदमे दर्ज हैं, जो अभी लंबित हैं।
2004 का गाजीपुर वाला मामला सबसे गंभीर
सबसे गंभीर मामला मुक़दमा अपराध संख्या 1572 वर्ष 2004 में जनपद गाजीपुर का है। आरोप है कि तत्कालीन भाजपा MLC डॉ. अशोक सिंह को विधानसभा के सामने आत्मदाह की धमकी तक देनी पड़ी थी, तब जाकर तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष अहमद हसन के प्रयासों से जालसाजी, धोखाधड़ी की गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज हुआ।
हाल ही में फर्जी वकालत रजिस्ट्रेशन की जांच के दौरान इस पुराने केस की फाइल खुली तो पता चला कि वर्ष 2010 में ही दया शंकर के विरुद्ध *धारा 409,467, 468, 471,120 बी, * में आरोप पत्र न्यायालय में प्रेषित किया गया जिसका संज्ञान न्यायालाय द्वारा दिनांक 22.10.2010 को लिया गया। आरोप है कि सेटिंग के चलते आज तक न तो उन्होंने न्यायालय में हाजिरी दी और न ही कोई विधिक कार्रवाई हुई।
अब इस पूरे प्रकरण की जांच के लिए जिला जज को प्रार्थना पत्र देकर लंबित कानूनी प्रक्रिया पर कार्रवाई की मांग की गई है।





