‘ए पी सिंह’ का महा-सर्कस: स्व-सेवा का ऐसा अनूठा मॉडल’ आपत्ति भी मेरी, निस्तारण भी मेरा और क्लीन चिट भी मेरी!

अनिल तिवारी, बेबाक पत्रकार
लखनऊ। प्राविधिक शिक्षा विभाग में इन दिनों ‘ए पी सिंह’ नाम की एक ऐसी जादुई लीला चल रही है, जिसे देखकर बड़े-बड़े जादूगर भी अपनी टोपी उतारकर हाथ जोड़ लें। विभाग में नियम क्या हैं? कानून की व्याख्या कैसे होती है? और शासन की आपत्तियों को हवा में कैसे उड़ाया जाता है? इन सारे सवालों का एक ही जवाब है—‘आत्म प्रकाश सिंह’ (उप निदेशक/विभागाध्यक्ष)।
पिछले समाचारों में इनकी कारगुजारियों की परतें उघेड़ी गई थीं, लेकिन ताजा मामला तो हास्य और व्यंग्य का ऐसा अनूठा तालमेल है जिसे इतिहास में ‘स्व-सेवा का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण’ कहा जाएगा।
जब ‘ए पी सिंह’ बने अपने ही मुंसिफ और खुद को ही दिया क्लीन चिट!
कहानी इतनी हास्यास्पद है कि शब्द भी चकरा जाएं:
ए पी सिंह उप निदेशक ने डीपीसी का प्रस्ताव तैयार किया… ए पी सिंह विभागध्यक्ष की सुविधा के अनुसार!
ए पी सिंह ने नियमों को तोड़ा मरोड़ा… ए पी सिंह की सहूलियत के लिए!
जब शासन ने आपत्ति जताई, तो ए पी सिंह ने स्वयं उस आपत्ति का ‘परीक्षण’ किया और बड़े ही दयालु भाव से ए पी सिंह के पक्ष में आपत्ति को खारिज कर दिया!
फिर ए पी सिंह स्वयं वही प्रस्ताव ख़ुद शासन और लोक सेवा आयोग ले कर गए और साबित कर दिया कि ए पी सिंह के पक्ष मे नियमों को तोड़ना बिल्कुल सही हैं!
सरल शब्दों में कहें तो—जज भी ए पी सिंह, वकील भी ए पी सिंह, गवाह भी ए पी सिंह और न्याय भी ए पी सिंह का!
ए आई सी टी ई का ‘ना’ और ए पी सिंह का ‘स्वयं-निस्तारण’
जब शासन ने थोड़ा सा धर्म संकट दिखाते हुए ए आई सी टी ई (अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद) से सलाह लेने को कहा, तो ए पी सिंह खुद ही ए आई सी टी ई पहुंच गए। अब ए आई सी टी ई ठहरा नियमों से बंधा संस्थान; उसने नियमों के विरुद्ध जाकर ए पी सिंह के पक्ष में सलाह देने से साफ इनकार कर दिया।
आम आदमी होता तो फाइल बंद करके बैठ जाता, लेकिन ‘ए पी सिंह’ तो ए पी सिंह हैं! जब ए आई सी टी ई ने पक्ष में रिपोर्ट नहीं दी, तो उन्होंने खुद ही उस नकारात्मक रिपोर्ट का निस्तारण कर दिया और फाइल आगे बढ़ा दी।
याद कीजिए इतिहास, अतीत में ए आई सी टी ई के नियमों के तहत प्रधानाचार्य और विभागाध्यक्ष का वेतन निर्धारण और डीपीसी तब तक रोक कर रखी जाती थी, जब तक ए आई सी टी ई हरी झंडी न दे दे। स्वयं माननीय मंत्री जी भी ऐसे मामलों को तब तक रोके रखते थे जब तक नियम आड़े आते थे। लेकिन धन्य हैं ए पी सिंह! जब बात इनकी अपनी कुर्सी और डीपीसी की आई, तो सारे नियम, परंपराएं और प्रशासनिक नैतिकता धरी की धरी रह गईं।
प्राविधिक शिक्षा का नया जादुई शो: जहाँ 13 साल के एम.टेक अधिकारी खोजता है प्राविधिक शिक्षा विभाग!
जब ‘नियम बने खिलौना’ और कोर्ट ने लगाई कड़ी फटकार
विभाग में नियमों से ऐसी छेड़छाड़ की गई है कि हंसी भी आए और रोना भी। ‘नियम बने खिलौना’ शीर्षक से उजागर हुए इस खेल में हास्यास्पद स्थिति यह है कि प्राविधिक शिक्षा विभाग में हेड या प्रिंसिपल बनने के लिए 13 वर्ष की आयु वाले एम.टेक. और पीएचडी अधिकारी की आवश्यकता जैसी अजीबो-गरीब शर्तें तय कर दी गईं, ताकि योग्य लोग बाहर रहें और चहेतों का राज चले। नतीजा यह हुआ कि आज पूरा विभाग खाली पड़ा है।
हाईकोर्ट की फटकार, आयोग की दुत्कार… फिर भी मंत्रीजी का दबाव ‘अपरम्पार’!
हाल ही में माननीय उच्च न्यायालय ने प्राविधिक शिक्षा विभाग को जमकर फटकार लगाई है। कोर्ट ने साफ-साफ पूछा कि- स्थाई नियुक्तियां करने के बजाय अपनी सुविधा के अनुसार ‘संबद्ध’ (अटैचमेंट) करके कामचलाऊ व्यवस्था क्यों चलाई जा रही है?
निदेशक के 2 पद क्यों खाली हैं?
सहायक निदेशक, अपर निदेशक और संयुक्त निदेशक के पद क्यों खाली हैं?
प्रधानाचार्य के 60% से अधिक पद और
सचिव (बोर्ड, जीकप) के पद क्यों खाली हैं?
सबूत इस बात के चीख-चीख कर गवाही दे रहे हैं कि लोक सेवा आयोग ने इनके प्रस्ताव को नियमविरुद्ध मानकर वापस लौटा दिया है, ए आई सी टी ई ने इनके पक्ष में कोई सलाह नहीं दी, और शासन भी इनकी नियमावली की गलत व्याख्याओं (जैसे आयु सीमा और विभागाध्यक्ष का श्रेणी-2 होना) से पूरी तरह असंतुष्ट है।
मंत्री जी का दबाव और सत्ता का नशा: जनता सब देख रही है!
इतनी फजीहत, आयोग की अस्वीकृति, ए आई सी टी ई का इनकार और हाईकोर्ट की तीखी फटकार के बावजूद ऐसा लगता है कि माननीय मंत्री जी पर सत्ता का ऐसा नशा चढ़ा है कि जो काम नियम-कानून से ना हो पाए, उसे अपने भारी दबाव से कराने पर आमादा हैं। मंत्री जी का यह ‘अदृश्य दबाव’ विभाग में वो सब करा रहा है जो कोई सोच भी नहीं सकता।
लेकिन मंत्री जी और उनके चहेते अधिकारी शायद यह भूल रहे हैं कि अभिमान चाहे कितना भी बड़ा हो, जनता और कानून की नज़र से छुपा नहीं रहता। कुर्सी और सत्ता का नशा स्थाई नहीं होता, लेकिन जनता का हिसाब स्थाई होता है।
अब विभाग के पीड़ित अधिकारियों और कर्मचारियों की आखिरी उम्मीद केवल माननीय मुख्यमंत्री जी से ही टिकी है। देखना यह है कि क्या मुख्यमंत्री जी इस ‘ए पी सिंह स्टाइल’ के स्व-निर्मित न्याय पर बुलडोजर चलाकर न्याय करेंगे, या फिर नियमों को खिलौना बनाने का यह हास्यास्पद नाटक ऐसे ही चलता रहेगा?





