नियमों की अनदेखी या प्रशासनिक लापरवाही? भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी का पर्यायवाची बनकर रह गया LDA

“लीचड़ डेवलपमेंट ऑथोरिटी”, यही नाम देना उचित रहेगा जो सिर्फ ऊपर से नीचे तक भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी का पर्यायवाची बनकर रह गया है। उसकी लापरवाही के कई उदाहरण हैं, अनगिनत उदाहरण हैं, जिसके अधिकारियों और कर्मचारियों का हर कदम सिर्फ़ भ्रष्टाचार की डगर पर बढ़ता है, जहां सिर्फ और सिर्फ सामाजिक सरोकारों और हितों को स्वार्थ के गढ्ढों में दफन कर दिया जाता है जिसकी परिणिति होती है अलीगंज के कथित कोचिंग सेंटर में 15 मासूम बच्चों की हत्या, जिसको शासन हादसे का नाम दे रहा है, बिना किसी शर्म के, लेकिन सोचिए उन बच्चों के बारे में जो अब अपना जीवन शुरू करने जा रहे थे, उनके माता पिता की आँखों के सपनों में उनका उज्ज्वल भविष्य बसा हुआ था लेकिन अचानक, बस अचानक कुछ ही पलों में उनकी आंखों के सपने आँसुओं से धुल जाते हैं और आंखों के सामने रह जाता है उन मासूमों का तड़प तड़प कर निर्जीव पड़ा शरीर जिसका पूरा श्रेय जाता है LDA के भ्रष्ट सिस्टम को जो मोटी रकम के लालच में आँखे बंद कर देता है और निर्मित होने देता है अवैध कब्रगाहों को, श्मशानों को जो कभी भी जीते जी किसी को भी मुर्दा कर देने में सक्षम होते हैं।

नीचे से लेकर ऊपर तक एक एक कर्मचारी/अधिकारी लिप्त है पूरे शहर में अवैध निर्माणों की बाढ़ लाने में। किस किसका नाम लिखा जाए, किस पद को दोषी न कहा जाए, दलालों से घिरा हुआ शहर की दशा दिशा तय करने वाला विभाग। लिखने में कोई गुरेज़ नहीं है कि सत्ता में बैठे लोग भी शामिल हैं, साझेदारी तय है, सब कुछ एक प्लानिंग के तहत हो रहा है। कुछ दिन अभियान चलेगा, कुछ सीलिंग होंगी, फिर शुरू होगा वही तांडव का सिलसिला, अवैध निर्माणों का सिलसिला,, क्योंकि ये सब हमारे सिस्टम में घुल चुका है, दूध से पानी अलग करने जैसा दुष्कर कार्य है। मरने के लिए जनता तो है ही। उसके बाद 🚒 डिपार्टमेंट की लचर व्यवस्था जो चंद पैसों की खातिर एन ओ सी नामक कागज़ देने में कत्तई समय नहीं लगाता है। करोड़ों का बजट मिलने के बाद भी आग पर काबू पाने में जान बचाने में लाचार।
सब तनख्वाह के साथ साथ विभागीय व्यापार में लिप्त हैं। सुरक्षित व्यापार जहां उधार भी नहीं है और बिना इन्वेस्टमेंट के पूरा लाभ।
ऐसे विभागों के एक एक कर्मचारी पर पूरी चौकीदारी की आवश्यकता है। बरबस याद आ जाता है ब्रिटिश हुकूमत का समय,, वो हंटर वाले शासन की जरूरत अब पुनः महसूस हो रही है।
अनिल तिवारी (अग्निकांड में तपती हुई लेखनी के साथ बेबाक पत्रकार)





