प्राविधिक शिक्षा विभाग में ‘मलाईदार’ कुर्सी का खेल: भेद खुलने के डर से स्थानांतरण नीति की धज्जियां उड़ाने की तैयारी!

लखनऊ। उत्तर प्रदेश के प्राविधिक शिक्षा विभाग में भ्रष्टाचार, मनमानी और स्थानांतरण नियमों को ताक पर रखने का एक बेहद गंभीर और चौंकाने वाला मामला सामने आया है। विभाग में तैनात एक ‘विशेष रसूखदार अधिकारी’ पर माननीय मंत्री जी की ऐसी अटूट कृपा बरस रही है कि वे पिछले 8-10 वर्षों से राजधानी लखनऊ के बी.टी.ई. के एक मलाईदार पद पर कुंडली मारकर बैठे हैं।
पहले नियम विरुद्ध सम्बद्धीकरण और उसके बाद से सेवा नियमावली के नियमों के विरुद्ध एक विशेष टेक्निकल सेल का गठन कर इनको और इनके जैसे सजातीय अधिकारियों को लखनऊ में से अवैध वसूली के सिंडिकेट के लिए तैनात किया गया है। जबकि seva नियमावली में ऐसे किसी भी सेल के गठन का कोई प्रावधान नहीं है। अब ताजा ‘विशेष सूत्रों’ से मिली जानकारी ने इस पूरे मामले में एक नया और सनसनीखेज मोड़ ला दिया है।
राज खुलने का डर, नीति को दरकिनार कर दोबारा तैनाती का चक्रव्यूह
विभागीय गलियारों से छनकर आ रही खबरों के मुताबिक, इन महाशय के बी.टी. ई. में चल रहे इस ‘खेल’ और कथित भ्रष्टाचार की परतें खुलने का डर अब आलाकमान को सताने लगा है। चर्चा है कि यदि इनको नियमविरुद्ध संबद्धता के कारण अपनी मूल संस्था में जाना पड़ा , तो सालों से दबे कई बड़े राज और “न्यूज़” बाहर आ जाएगी। इसी डर के कारण, वर्तमान स्थानांतरण प्रक्रिया में स्थानीय नीति (Transfer Policy) का सरेआम उल्लंघन करते हुए इन महाशय को उसी पद पर तैनात बनाए रखने की बैकडोर तैयारी चल रही है, ताकि ‘सिंडिकेट’ पर कोई आंच न आए।
मूल संस्था से दूरी, छात्रों के भविष्य से खिलवाड़
आश्चर्य की बात यह है कि इन अधिकारी की मूल तैनाती प्रदेश के गरीब छात्र-छात्राओं को तकनीकी शिक्षा देने और पठन-पाठन की व्यवस्था संभालने (टीचिंग कैडर) के लिए की गई थी। लेकिन, राजनीतिक रसूख के दम पर इन्होंने अपनी मूल संस्था का रुख आज तक नहीं किया। हालात यह हैं कि पॉलीटेक्निक के छात्र बेहतर शिक्षा के लिए तरस रहे हैं, और महाशय सालों से चाक-डस्टर को हाथ लगाए बिना लखनऊ के वातानुकूलित कमरों में ऐश काट रहे हैं।
वेतन प्रमुख सचिव जैसा, पर कार्यशैली पर गंभीर सवाल
विभागीय सूत्रों के अनुसार, इन विशेष अधिकारी का लगातार प्रमोशन भी हो चुका है और वर्तमान में वे 9000 ग्रेड पे (लेवल-13A1/14) पा रहे हैं और प्रयागराज की जिस संस्था में इनकी तैनाती की गई है वहाँ के छात्राओं ने आज तक इन महाशय की शक्ल भी भी देखी है , इनका वेतनमान शासन के प्रमुख सचिव स्तर के बराबर होता है। जनता के टैक्स के पैसे से इतना मोटा वेतन उठाने वाले इन अधिकारी का मुख्य कार्य विभाग की बेहतरी के बजाय, कथित तौर पर एक ‘अवैध वसूली सिंडिकेट’ को संचालित करना और अपनी कुर्सी बचाए रखना बनकर रह गया है।
सरकार की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति को खुली चुनौती
माननीय मंत्री जी की तथाकथित ‘जातिगत’ हमदर्दी और संरक्षण के कारण ये अधिकारी ‘येन-केन-प्रकारेण’ लखनऊ से हिलने का नाम नहीं ले रहे हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी की भ्रष्टाचार और रसूखदारों के खिलाफ **’जीरो टॉलरेंस’** की नीति को यह विभागीय व्यवस्था खुलेआम ठेंगा दिखा रही है।
तबादला नीति की धज्जियां उड़ाकर एक ही मलाईदार सीट पर दोबारा काबिज होने की इस कोशिश से विभाग के ईमानदार अधिकारियों, शिक्षकों और गरीब छात्रों में भारी आक्रोश है। अब देखना यह है कि स्थानांतरण नीति के इस खुले उल्लंघन पर मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) संज्ञान लेता है या यह वीआईपी संस्कृति इसी तरह नियमों को रौंदती रहेगी।
अनिल तिवारी
बेबाक पत्रकार



