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सनसनीखेज खुलासा: ‘सबका साथ’ के नारे के बीच प्राविधिक शिक्षा विभाग में ‘जातिवाद का खेल’, ट्रांसफर लिस्ट में नियमों की धज्जियां उड़ाकर चहेतों को बांटी मलाईदार पोस्टिंग!

सियासत का दोहरा चेहरा: कल तक जो सरकार को घेर रही थीं, आज उन्हीं के पति के संरक्षण में चल रहा सिंडिकेट

यह वही उत्तर प्रदेश की राजनीति है जहाँ कुछ समय पहले तक माननीय प्राविधिक शिक्षा मंत्री श्री आशीष पटेल जी की धर्मपत्नी (जो स्वयं केंद्र सरकार में माननीय मंत्री हैं), प्रदेश सरकार के खिलाफ अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) का झंडा बुलंद कर रही थीं। वह लगातार सरकार पर पिछड़ा वर्ग के साथ भेदभाव करने का आरोप लगा रही थीं। लेकिन आज पासा पूरी तरह पलट चुका है। स्थिति यह है कि प्राविधिक शिक्षा विभाग में उनके पति के संरक्षण में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की तमाम जातियों का वजूद ही खत्म कर दिया गया है। नियमों, कानूनों और शासनादेशों को ताक पर रखकर सिर्फ एक विशेष जाति ‘कुर्मी’ को हर प्रकार का अनुचित लाभ पहुंचाने और नीति-निर्धारक पदों पर एकाधिकार स्थापित करने का भीषण खेल चल रहा है।

करोड़ों का खेल या जातिगत प्रेम? ट्रांसफर लिस्ट और ‘विभागाध्यक्ष सिंडिकेट’ खोल रहा पोल

हाल ही में जारी हुई स्थानांतरण सूची (Transfer List) और पूर्व की तैनातियों का यदि बारीकी से अवलोकन किया जाए, तो साफ हो जाता है कि किस प्रकार एक विशेष जाति से आने वाले अधिकारियों को नियम विरुद्ध तैनातियां दी गई हैं। प्राविधिक शिक्षा विभाग के अप्लाइड साइंस के वरिष्ठ शिक्षकों को एकदम हाशिये पर ला दिया गया है।

SC/ST व अन्य वर्ग के अधिकारियों से ‘नफरत’ और दंडात्मक कार्रवाई: एक तरफ जहां अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य वर्ग के ईमानदार अधिकारियों ने अपनी मेहनत से संस्थाओं को ऊपर उठाया, वहां का शैक्षणिक माहौल सुधारा; उन्हें इनाम देने के बजाय दूर-दराज के क्षेत्रों में ‘फेंक’ दिया गया। आवाज़ उठाने वाले अन्य वर्ग के अधिकारियों (जैसे शिकायतकर्ता व गजेंद्र सिंह लोधी) को तत्काल निलंबित कर दिया गया, जो दंडात्मक कार्रवाई में दोहरे मापदंड को दर्शाता है।

बनी-बनाई मलाईदार जगहों पर चहेतों का कब्जा: उन अधिकारियों द्वारा तैयार किए गए मलाईदार और बड़े शहरों के संस्थानों में केवल एक विशेष जाति के लोगों को नियमों के खिलाफ जाकर पोस्टिंग दी गई है।

राजधानी (लखनऊ) व प्रमुख स्थानों पर नियम विरुद्ध ‘विभागाध्यक्ष सिंडिकेट’: इंद्रजीत सचान, रवि सचान, संदीप कुमार सिंह, प्रदीप कुमार, आनंद सचान, जोखू लाल पटेल और अरुण कुमार सिंह जैसे विभागाध्यक्ष 15 से 20 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद भी जोड़-तोड़ कर राजधानी और प्रमुख स्थानों पर ही अंगद के पैर की तरह जमे हुए हैं। यह एक ही विशेष वर्ग द्वारा ‘सिस्टम कैप्चरिंग’ का जीता-जागता उदाहरण है।

5 से 12 लाख की ‘भयंकर कीमत’ और ऑनलाइन ट्रांसफर नीति की नाकामी

सूत्रों के मुताबिक, यदि किसी दूसरी जाति के अधिकारी को कोई राहत या मनचाही पोस्टिंग दी भी गई, तो उनसे इसके बदले 5 से 12 लाख रुपये की ‘भयंकर कीमत’ वसूली गई है। ट्रांसफर उद्योग के कुछ चौंकाने वाले उदाहरण सीधे तौर पर सामने आ रहे हैं:

1. कानपुर का खेल: एक अधिकारी ने कानपुर में 9 वर्ष तक लेक्चरर के रूप में सेवा दी। दो साल पहले ही उनका प्रमोशन विभागाध्यक्ष (HOD) के पद पर हुआ। शासनादेश के अनुसार कोई भी अधिकारी एक जिले में अधिकतम 3 वर्ष और मंडल में 7 वर्ष ही रुक सकता है। लेकिन कथित तौर पर मोटी रकम लेकर उन्हें पुनः कानपुर में ही विभागाध्यक्ष के पद पर तैनात कर दिया गया।

2. गृह जनपद का लालच: इसी प्रकार कई अन्य महानुभावों से भारी रकम लेकर उन्हें उनके ही गृह जनपद (Home District) में नियम विरुद्ध तैनाती दे दी गई।

3. झांसी मंडल में 12 साल का रिकॉर्ड: एक और रसूखदार अधिकारी हैं जिन्होंने झांसी मंडल में लगातार 20 साल सेवा दी। लेकिन ‘पैसे के दम’ पर उन्हें दोबारा क्लास वन (Class 1) की पोस्ट पर उसी मंडल में तैनात कर दिया गया साथ ही झाँसी का अतिरिक्त चार्ज ड़े दिया गया ।

4. ऑनलाइन ट्रांसफर को फेल करने की साज़िश: यह पूरा भ्रष्टाचार और चहेतों को मलाई बांटने का खेल इसलिए मुमकिन हो पाया क्योंकि विभाग की पारदर्शी ‘ऑनलाइन ट्रांसफर व्यवस्था’ को दरकिनार कर दिया गया। बैकडोर से अपने चहेतों को मनचाही जगह देने के लिए जानबूझकर ऑनलाइन माध्यम से ट्रांसफर प्रक्रिया को सही तरीके से लागू ही नहीं होने दिया गया।

22 साल की नौकरी में सिर्फ 4 साल पढ़ाया, चौक-डस्टर को कभी हाथ नहीं लगाया!

इस विभाग में भ्रष्टाचार और रसूख का ऐसा अनोखा उदाहरण सामने आया है जिसने शैक्षणिक मर्यादा को तार-तार कर दिया है। इसी विशेष जाति से आने वाले एक ‘विशिष्ट’ महानुभाव आत्म प्रकाश सिंह (विभागाध्यक्ष) ने अपनी 22 साल की सरकारी सेवा में कभी चौक-डस्टर को हाथ तक नहीं लगाया। पूरी नौकरी में उन्होंने मात्र 4 वर्ष ही शिक्षण कार्य किया है। बाकी के 18 साल वह अपने ऊंचे जुगाड़ और रसूख के दम पर कभी डेपुटेशन (प्रतिनियुक्ति) तो कभी अटैचमेंट के बहाने मलाई काटते रहे।

विशेष कृपा और पूर्ण वेतन के साथ ‘स्टडी लीव’: इन महानुभाव और इनके ही जैसे कुछ अन्य ‘मित्रों’ पर विभाग की ऐसी असीम कृपा रही कि इन्हें ‘पूर्ण वेतन’ के साथ विशेष अध्ययन अवकाश (Study Leave) स्वीकृत किया गया। यह ऐसी अनोखी सुविधा है जो आज तक विभाग में किसी अन्य योग्य शिक्षक को प्राप्त नहीं हुई।

कमल कुमार के बारे में आशंका हुई सच: पूर्व में कमल कुमार (विभागाध्यक्ष) के बारे में जो आशंकाएं जताई गई थीं, वे आज पूरी तरह सच साबित हो चुकी हैं। विकल्प कुमार सिंह, कमल कुमार और अवधेश कुमार पटेल जैसे अधिकारी पिछले कई वर्षों से बीटीई, जेईईसीयूपी (JEECUP) और फीस नियमन समिति जैसी मलाईदार जगहों पर नियमविरुद्ध डटे हुए हैं। ये लोग 10 वर्षों से ज्यादा समय से शिक्षण कार्य छोड़ चुके हैं और विभागीय राजनीति व अवैध वसूली के सिंडिकेट का मुख्य हिस्सा बने हुए हैं।

नियम विरुद्ध ‘टेक्निकल सेल’ का गठन और अवैध वसूली का समानांतर सत्ता केंद्र

छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ की पराकाष्ठा तो देखिए! एक तरफ जहां पूरे विभाग में टीचिंग स्टाफ की भारी कमी है, वहीं प्रमुख सचिव के बराबर वेतन पाने वाले इन रसूखदार अधिकारियों को अनुचित लाभ पहुंचाने और ‘धन उगाही’ का रास्ता साफ करने के लिए एक नियम विरुद्ध ‘टेक्निकल सेल‘ का गठन कर दिया गया।

ऑनलाइन ट्रांसफर न करने की वजह: विशेष टेक्निकल सेल का कोई कार्य नहीं किया गया ये लोग ऑनलाइन प्रक्रिया तक ना कर सके ताकि चहेतों को बैकडोर से मनचाही पोस्टिंग दी जा सके और अवैध वसूली का सिंडिकेट बिना किसी रुकावट के चल सके।

मूल संस्था से गायब प्रवक्ता: विवेकानंद और सुनील कुमार जैसे प्रवक्ता अपनी मूल संस्थाओं में योगदान देने के बजाय इस सिंडिकेट के माध्यम से अवैध वसूली के खेल में संलिप्त हैं। रोहित कटियार और जितेन्द्र यादव जैसे व्याख्याता अपनी नियुक्ति के मात्र 11 महीने बाद ही मूल संस्था छोड़कर संयुक्त निदेशक कार्यालयों में संबद्ध होकर अवैध वसूली का सिंडिकेट चला रहे हैं।

निदेशालय नियमों का कत्लेआम: विभाग में निदेशालय (Directorate) में किसी भी अधिकारी को दोबारा पोस्टिंग न देने का अटूट नियम रहा है। लेकिन लाल जी पटेल और दिनेश कुमार मौर्या (उप निदेशक, निदेशालय) जैसे अधिकारियों को अपनी विशेष जाति के होने के कारण निदेशालय में लंबे समय से जमा कर रखा गया है, जो केवल अपने वर्ग के हितों के लिए नियम बनाते हैं।

प्रमुख सचिव और राजनेताओं के संरक्षण का खुला खेल

समाचार पत्र के अनुसार, इस पूरे भ्रष्टाचार के सिंडिकेट को मानवेंद्र कन्नौजिया (उप-सचिव) और विकल्प कुमार सिंह (विभागाध्यक्ष) जैसे लोग संचालित कर रहे हैं। विकल्प कुमार सिंह सरेआम खुले आम लोगों से कहते फिरते हैं कि— “मैं ही परिषद में जॉइंट सेक्रेटरी के पद पर आ रहा हूँ, मैं ही यू राइज की तरह एक और विभागीय पोर्टल बनवाऊंगा, शासन में सब सेट कर दूंगा और अपने चहेतों को लखनऊ में तैनात कराऊंगा, मंत्री से मेरी सीधी बात है।”

इतना ही नहीं, महिला कर्मचारियों और छात्राओं के मानसिक व शारीरिक शोषण के आरोपी राकेश पटेल (प्रधानाचार्य, एमएइआईटी कौशाम्बी) को जिलाधिकारी द्वारा अत्यंत गंभीर प्रतिकूल टिप्पणियां दिए जाने के बावजूद विभागीय मंत्री द्वारा संरक्षण दिया जा रहा है और पुनः किसी महत्वपूर्ण व मलाईदार स्थान पर स्थापित करने का षड्यंत्र रचा जा रहा है। वहीं विपक्षी दल की विधायिका पल्लवी पटेल के साथ मिलकर सरकार विरोधी प्रेस कॉन्फ्रेंस करने वाले प्रधानाचार्य राज बहादुर सिंह (पूर्व ओएसडी मंत्री) पर कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की गई।

बड़ा सवाल:

क्या सूबे के मुखिया इस महाघोटाले और ट्रांसफर लिस्ट की उच्च स्तरीय जांच कराएंगे? क्या ‘जीरो टॉलरेंस’ का दावा करने वाली सरकार में इस तरह के जातिगत भेदभाव, अवैध वसूली सिंडिकेट और खुलेआम नियम-कानूनों की धज्जियां उड़ाने वाले कैबिनेट मंत्री और उनके चहेते अधिकारियों पर कोई बुल्डोजर जैसी कार्रवाई होगी, या फिर रसूख के आगे सरकार के सारे नियम और साख बौने साबित होते रहेंगे?

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